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Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 || व्याघ्रपथिककथा (Vyaaghrapathikakatha) का सम्पूर्ण हल हिंदी में || Bihar Board Sanskrit Objective Questions

Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 || Sanskrit Piyusham Bhag 2 (vyaaghrapathikakatha)


इस पाठ व्याघ्रपथिककथा में Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 || vyaaghrapathikakatha, के अंतर्गत नारायण पंडित जी द्वारा रचित “हितोपदेश” नामक नीतिकथा ग्रंथ के “मित्रलाभ” खंड से लिया गया है। हितोपदेश में बालकों के मनोरंजन और नीति शिक्षण हेतु बहुत सारे कार्यक्षेत्रौं में कई कथाएँ हैं, जिसमें पशु-पक्षियों से संबंधित कथाएँ प्रमुख हैं। Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 || व्याघ्रपथिककथा के माध्यम से हम लोभ की कुछ बिउचिद् नुक्सान पहुँचानियां को समझ सकते हैं। Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 ||

Table of Contents

व्याघ्रपथिककथा में ऐसी कहानियाँ निहित हैं, जो बच्चों के लिए मनोरंजक और शिक्षाप्रद हैं। यह पाठ विशेष रूप से Bihar Board Exam Objective Questions की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए लाभदायक होगा, क्योंकि यह परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। “ Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 || व्याघ्रपथिककथा” में लोभ का दुष्परिणाम और पशु-पक्षी कथाओं का मूल्य बताया गया, जो मानवों के लिए प्रभावशाली शिक्षा का माध्यम है। Bihar Board Exam Objective Questions की तैयारी में भी इस अध्याय की कथाएँ उपयोगी होती हैं, जो बच्चों को नीति का ज्ञान कराने में सहायक होती हैं।

Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 || व्याघ्रपथिककथा || 1st Paragraph

[अयं पाठः नारायणपण्डितरचितस्य हितोपदेशनामकस्य नीतिकथाग्रन्थस्य मित्रलाभनामकखण्डात् सङ्कलितः । हितोपदेशे बालकानां मनोरञ्जनाय नीतिशिक्षणाय च नानाकथाः पशुपक्षिसम्बद्धाः श्राविताः । प्रस्तुतकथायां लोभस्य दुष्परिणामः प्रकटितः । पशुपक्षिकथानां मूल्यं मानवानां शिक्षार्थं प्रभूतं भवति । इति एतादृशीभिः कथाभिः ज्ञायते ।]

Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 का संधि-विच्छेद (Sandhi Vichchhed):-
  • दुष्परिणामः = दुः + परिणामः ।
  • शिक्षार्थं = शिक्षा + अर्थं ।
शब्दार्थ :-
  • बालकानां – बालकों के ।
  • मनोरञ्जनाय – मनोरंजन के लिए ।
  • नानाकथाः – अनेक कथा / कहानियाँ ।
  • श्राविताः – सुनाते हैं ।
  • शिक्षार्थं – शिक्षा के लिए ।
  • एतादृशीभिः – इसी तरह का ।

[हिन्दी व्याख्या :- यह पाठ नारायण पंडित जी द्वारा विरचित हितोपदेश नामक नीतिकथा ग्रंथ के मित्रलाभ नामक खंड से संकलित हैं । हितोपदेश नामक ग्रंथ में बालकों के मनोरंजन और नीति शिक्षण के लिए अनेक कथा पशु – पक्षी से संबंधित सुनाते हैं । प्रस्तुत कथा में लोभ का दुष्परिणाम प्रकट होता है । पशु – पक्षी कथाओं के मूल्य मानवों के शिक्षा के लिए बहुत अधिक प्रभावशाली होता है । ऐसी इसी कथा से ज्ञात होता है। ]

Bihar Board संस्कृत पीयूषम भाग – 2 के सम्पूर्ण अध्याय का हिंदी में Solutions के लिये यहाँ क्लिक करें

Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 का वस्तुनिष्ठ प्रश्न :-

Q1. “व्याघ्रपथिककथा” के रचनाकार कौन है ?
उत्तर:-  नारायण पंडित ।

Q2. “व्याघ्रपथिककथा” किस ग्रंथ से लिया गया है ?
उत्तर:-  हितोपदेश ग्रंथ से ।

Q3. “व्याघ्रपथिककथा” किसका दुष्परिणाम प्रकट होता है ?
उत्तर:-  लोभ का ।

Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 का

2nd Paragraph

[ कश्चित वृद्धव्याघ्रः स्नातः कुशहस्तः सरस्वतीरे ब्रुते – ‘भो भोः पान्थाः। इदं सुवर्णकङ्कणं गृह्यताम् ।’ ततो लोभाकृष्टेन केनचित्पान्थेनालोचितम् – भाग्येनैतत्संभवति । किंत्वस्मिन्नात्मसंदेहे प्रवृत्तिर्न विधेया । यतः –

 अनिष्टादिष्टलाभेऽपि न गतिर्जायते शुभा ।

यत्रास्ते विषसंसर्गोऽमृतं तदपि मृत्यवे ।।

संधि-विच्छेद (Sandhi Vichchhed) :-
  • सरस्तीरे – सरः + तीरे ।
  • लोभाकृष्टेन = लोभ + आकृष्टेन ।
  • केनचित्पान्थेनालोचितम् = केनचित् + पान्थेन + आलोचितम् ।
  • भाग्येनैतत्संभवति = भाग्येन् + एतत् + संभवति ।
  • किंत्वस्मिन्नात्मसंदेहे = किम् + तु + अस्मिन् + आत्मसंदेहे ।
  • प्रवृत्तिर्न = प्रवृत्तिः + न ।
  • अनिष्टादिष्टलाभेऽपि = अनिष्टात् + इष्टलाभे + अपि ।
  • गतिर्जायते = गतिः + जायते ।
  • विषसंसर्गोऽमृतं = विषसंसर्गः + अमृतम् ।
  • तदपि = तत् + अपि ।
शब्दार्थ:-
  • कश्चित् – कोई ।
  • वृद्धव्याघ्रः – बूढ़ा बाघ ।
  • स्नातः – नहाया हुआ ।
  • हस्तः – हाथ ।
  • सरस्तीरे – तालाब के किनारे ।
  • ब्रुते – बोल रहा था ।
  • भोः – सुनो ।
  • पान्थाः – पथिकों ।
  • सुवर्णकङ्कण् – सोने का कंगन ।
  • केनचित् – किसी ।
  • आलोचितम् – विचार किया ।
  • एतत् – यह ।
  • प्रवृत्तिः – कार्य ।
  • लोभाकृष्टेन – लोभ से आकर्षित ।
  • अनिष्टात् – अनिच्छित ।
  • विषसंसर्गः – विषयूक्त ।

• हिन्दी व्याख्या :- कोई बूढ़ा बाघ स्नान किया हुआ हाथ में कुश लिए तालाब के किनारे बोल रहा था – सुनो – सुनो पथिकों । यह सोने का कंगन ग्रहण करो । उसके बाद लोभ से आकृष्ट होकर किसी पथिक द्वारा सोचा गया – कि भाग्य से ही ऐसा संभव होता है । किंतु किसी इस आत्म संदेह में कार्य नहीं करना चाहिए । 

क्योंकि –

अनिष्ट (अनिच्छित) से इष्ट (इच्छित) लाभ में भी शुभ गति नहीं होता है , क्योंकि विषयुक्त अमृत पीने से भी मृत्यु निश्चित होता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न :-

Q1. कौन स्नान कर तालाब के किनारे बोल रहा था ?
उत्तर:-  बूढ़ा बाघ ।

Q2. सोने का कंगन कौन देना चाहते थे ?
उत्तर:-  बूढ़ा बाघ ।

Q3. विष युक्त अमृत पीने से भी ——– निश्चित होता है ?
उत्तर:-  मृत्यु ।

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3rd Paragraph

[ किंतु सर्वत्रार्थार्जने प्रवृतिः संदेह एव । तन्निरूपयामि तावत् ।’ प्रकाशं ब्रुते – ‘ कुत्र तव कङ्कणम् ?’ व्याघ्रो हस्तं प्रसार्य दर्शयति । पान्थोऽवदत् – ‘कथं मारात्मके त्वयि विश्वासः ? व्याघ्रः उवाच – श्रृणु रे पान्थ ! प्रागेव यौवनदशायामतिदुर्वृत्त आसम् । अनेकगोमानुषाणां वधान्मे पुत्रा मृता दाराश्च । वंशहीनश्चाहम् । ततः केनचिद्धार्मिकेणाहमादिष्टः – ‘दानधर्मादिकं’ चरतु भवान् । तदुपदेशादिदानीमहं स्नानशीलो दाता वृद्धो गलितनखदन्तो कथं न विश्वासभूमिः ? मया च धर्मशास्त्राण्यधीतानि । शृणु –  

 दरिद्रान्भर कौन्तेय ! मा प्रयच्छेश्वरे धनम् ।

व्याधितस्यौषधं पथ्यं , नीरूजस्य किमौषधे ।।

अन्यच्च – 

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।

देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं विदुः ।।]

संधि-विच्छेद (Sandhi Vichchhed) :-
  • सर्वत्रार्थार्जने = सर्वत्र + अर्थ + अर्जने ।
  • तन्निरूपयामि = तत् + निरूपयामि ।
  • पान्थोऽवदत् = पान्थः + अवदत् ।
  • प्रागेव = प्राक् + एव ।
  • यौवनदशायामतिदुर्वृत्त = यौवनदशायाम् + अति + दुर्वृत्त ।
  • वधान्मे = वधात् + मे ।
  • दाराश्च = दाराः + च ।
  • वंशहीनश्चाहम् = वंशहीनः + च + अहम् ।
  • केनचिद्धार्मिकेणाहमादिष्टः – केनचित् + धार्मिकेण + अहम् + आदिष्टः ।
  • तदुपदेशादिदानीमहं = तत् + उपदेशात् + इदानीम् + अहम् ।
  • धर्मशास्त्राण्यधीतानि = धर्मशास्त्राणि + अधीतानि ।
  • प्रयच्छेश्वरे = प्रयच्छ + ईश्वरे ।
  • व्याधितस्यौषधं = व्याधितस्य + औषधं ।
  • किमौषधेः = किम् + औषधि ।
  • अन्यच्च = अन्यत् + च ।
  • दातव्यमिति = दातव्यम् + इति ।
  • यद्दानं = यत् + दानम् ।
  • दीयतेऽनुपकारिणे = दीयते + अनुपकारिणे ।
  • तद्दानम् = तत् + दानम् ।
शब्दार्थ :-
  • सर्वत्र – सभी जगह ।
  • अर्थ – धन ।
  • तावत् – जैसे ही ।
  • प्रकाशं – खुलकर ।
  • तव – तुम्हारा ।
  • प्रसार्य – फैलाकर ।
  • अवदत् – बोला ।
  • मारात्मके :- हत्यारे पर ।
  • उवाच – बोला ।
  • श्रृणु – सुनो ।
  • प्रागेव – पहले ही ।
  • दुर्वृत्त – दुराचारी ।
  • आसम् – धे ।
  • वधान्मे – वध से ।
  • दारा – पत्नी ।
  • ततः – इसके बाद ।
  • आदिष्टः – आदेश पाना ।
  • चरतु – करें ।
  • भवान् – आप ।
  • मया – मेरे द्वारा ।
  • मा – मत ।
  • प्रयच्छ् – देना ।

• हिन्दी व्याख्या :- किंतु सभी जगह धन अर्जन योग्य कार्य में संदेह ही है । तब तक ठहरता हूँ । खुलकर (जोर से) बोला – तुम्हारा कंगन कहाँ है ? बाघ हाथ फैलाकर दिखाता है । पथिक ने बोला – कैसे तुम जैसे हत्यारे पर विश्वास करें ? बाघ बोला – सुनो रे पथिक ! पहले ही युवा अवस्था में मैं बहुत दुराचारी था । अनेक गाय और मनुष्यों के वध से मेरे पुत्र और पतनियाँ मर गए । मैं वंशहीन हूँ । इसके बाद मैं किसी धार्मिक व्यक्ति द्वारा आदेश पाया कि – आप दान , धर्म आदि करें । मैं उसके उपदेश से इस समय स्नान कर दाता बनकर वृद्ध टूटे हुए नाखून और दांतों से हीन कैसे न विश्वास के पात्र हूँ ? और मेरे द्वारा धर्मशास्त्रों में पढ़ा गया सुनो – 

धर्मशास्त्रों में श्री कृष्ण कुंती पुत्र से कहा है, कि हे ! कौन्तेय यदि धन देना हो, तो दरिद्रों को दो धनवानो को धन मत दो । क्योंकि औषधि और पथ्य रोगियों के लिए है , निरोगियों के लिए औषधि और पथ्य का क्या कार्य ।

और दूसरा – 

हे ! कौन्तेय यदि दान देना हो, तो अनुपकारियों में दो अर्थात् जिन्होंने कभी तुम पर उपकार नहीं किया हो । और सही स्थान, सही समय और सही व्यक्ति को दिया गया दान सात्विक दान कहलाता है । 

वस्तुनिष्ठ प्रश्न :-

Q1. बाघ हाथ पसारकर क्या दिखा रहा था ?
उत्तर:-  सोने का कंगन ।

Q2. बूढ़ा बाघ किस अवस्था में बहुत दुराचारी था ?
उत्तर:-  यौवन अवस्था में ।

Q3. अनेक गाय और मनुष्यों के वध से किसका पुत्र और पत्नी मर गए ?
उत्तर:-  बूढ़ा बाघ का ।

Q4. कौन वंशहीन था ?
उत्तर:-  बूढ़ा बाघ ।

Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 का

4th Paragraph

[ तदत्र सरसि स्नात्वा सुवर्णकङ्कणं गृहाण । ततो यावदसौ तद्वचः प्रतीतो लोभात्सरः स्नातुं प्रविशति तावन्महापङ्के निम्गनः पलायितुम: । पङ्के पतितं दृष्ट्वा व्याघ्रोऽवदत् – ‘अहह, महाङ्के पतितोऽसि । अतस्त्वामहमुत्थापयामि । इत्युक्त्वा शनैः शनैरूपगम्य तेन व्याघ्रेण धृतः स पान्थोऽचिन्तयत् – 

अवशेन्द्रियचित्तानां हस्तिस्नानमिव क्रिया ।

दुर्भगाभरणप्रायो ज्ञानं भारः क्रियां विना ।।

इति चिन्तयन्नेवासौ व्याघ्रेण व्यापादितः खादितश्च । अत उच्यते – 

कङ्णस्य तु लोभेन मग्नः पङ्के सुदुस्तरे ।

वृद्धव्याध्रेण संप्राप्तः पथिकः स मृतो यथा ।।

]

संधि-विच्छेद (Sandhi Vichchhed) :-
  • तदत्र = तत् + अत्र ।
  • यावदसौ = यावत् + असौ ।
  • तद्वचः = तत् + वचः ।
  • लोभात्सरः = लोभात् + सरः ।
  • तावन्महापङ्के = तावत् + महापङ्के ।
  • पलायितुमक्षमः = पलायितुम + अक्षमः ।
  • व्याघ्रोऽवदत् = व्याघ्रः + अवदत् ।
  • पतितोऽसि = पतितः + असि ।
  • अतस्त्वामहमुत्थापयामि = अतः + त्वाम् + उत्थापयामि ।
  • इत्युक्त्वा = इति + उक्त्वा ।
  • शनैरूपगम्य = शनैः + उपगम्य ।
  • पान्थोऽचिन्तयत् = पान्थः + अचिन्तयत् ।
  • हस्तिस्नानमिव = हस्ति + स्नानम् + इव ।
  • चिन्तयन्नेवासौ = चिन्तयन् + असौ ।
  • खादितश्च = खादितः + च ।
शब्दार्थ :-
  • स्नात्वा – स्नानकर ।
  • गृहाण – ग्रहण करो ।
  • यावदसौ – जैसे वह ।
  • वचः – वाणी ।
  • प्रतीतो – पालन कर ।
  • स्नातुं – स्नान करने के लिए ।
  • महापङ्के – महा कीचड़ में ।
  • निमग्नः – फँस गया ।
  • दृष्ट्वा – देखकर ।
  • त्वाम् – तुम्हें ।
  • उत्थापयामि – उठाता हूँ ।
  • इत्युक्त्वा – ऐसा कहकर ।
  • उपगम्य – समीप ।
  • हस्तिस्नानमिव – हाथी स्नान के समान ।
  • व्यापादितः – घेरा गया ।
  • खादितः – खाया गया ।
  • उच्यते – कहा जाता है ।
  • तु – तो ।
  • मग्नः – फँसा हुआ ।

• हिन्दी व्याख्या :- इसी तालाब में स्नान कर सोने का कंगन ग्रहण करो । इसके बाद वह जैसे ही उसके वचन को पालन कर लोभ से तालाब में स्नान के लिए प्रवेश करता है वैसे ही महा कीचड़ में फँसकर भागने में असमर्थ हो जाता है । कीचड़ में गिरा हुआ देखकर बाघ बोला – अहह ! महा किचड़ में गिर गए हो । इसलिए मैं तुम्हें उठता हूँ । ऐसा कहकर धीरे-धीरे उस बाघ के द्वारा घेरा गया इसके बाद उस पथिक द्वारा सोचा गया –

यदि मनुष्य का मन और इंद्रियाँ वश में नहीं होता है, तो उसकी गति हाथी स्नान के समान होता है, क्योंकि दुर्भाग्य से प्राप्त ज्ञान क्रिया के बिना भार स्वरूप होता है ।

वह ऐसा सोचते हुए वृद्ध बाघ के द्वारा मारा और खाया गया । इसलिए कहा जाता है – 

कंगन के लोभ से कीचड़ में फँसा वह पथिक वृद्ध बाघ के द्वारा मारा गया ।

Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 का वस्तुनिष्ठ प्रश्न :-

Q1. महा कीचड़ में कौन फंस गया ?
उत्तर:-  पथिक ।

Q2. पथिक किसके द्वारा मारा और खाया गया ?
उत्तर:-  बूढ़ा बाघ ।

Q3. किसके बिना ज्ञान भार के समान होता है ?
उत्तर:-  क्रिया के बिना ।

Q4. कंगन के लोभ से पथिक कहां फंस गया ?
उत्तर:-  कीचड़ में ।

Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 का

बिहार बोर्ड एग्जाम में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण हिंदी प्रश्नोत्तर निम्नलिखित है :-

Q1.व्याघ्रपथिक कथा से क्या शिक्षा मिलती है ? (Vyaghrapathik katha se kya shiksha milti hain ?)

उत्तर:-व्याघ्रपथिक कथा” नारायण पंडित जी द्वारा विरचित हितोपदेश के नीतिकथा ग्रंथ के मित्रलाभ नामक खंड से संकलित है। इस कथा में एक पथिक वृद्ध बाघ द्वारा अर्पित स्वर्ण कंगन के प्रलोभन से आकृष्ट होता है और बाघ के मिथ्या वह सटीक तर्क से अभिभूत होकर स्वर्ण कंगन लेना उचित समझता है एवं बाघ द्वारा मारा जाता है।
                           अतः उपर्युक्त तथ्य से हमें संदेश मिलता है कि नरभक्षी एवं अविश्वासी प्राणियों पर विश्वास नहीं करना चाहिए ।

Q2.वृद्धव्याघ्र के चरित्र - चित्रण करें । (Vriddhvyaghra ke chaaritra-chitran karen ?)

उत्तर:- बाघ आचरण से अविश्वासी वह नरभक्षी प्राणी होता है । वह धार्मिक उपदेश के द्वारा अर्पित स्वर्ण कंगन एवं मिथ्या वचनों से विश्वास के योग्य होते हैं । और एक अति निर्धन पथिक को उसके आचरण से वसीभूत हो जाता है , बाघ विश्वास घातकर पथिक को मारकर खा जाता है।
                            अतः बाघ एक अविश्वासी चरित्र को प्रकट करता है ।

Q3."व्याघ्रपथिक कथा" से जीवन में क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तर:- नारायण पंडित जी द्वारा रचित कथा नीतिपरक और आदर्श परक है । इस कथा से शिक्षा मिलती है, कि मानवों को लोभवश अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहिए व बिना सोचे और विचार किये कोई कार्य नहीं करना चाहिए ।
               अतः मानवों के काम, क्रोध, लोभ एवं मोह रहित निष्पक्ष भाव से कोई कार्य करना चाहिए ।

Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 का

अभ्यासः मौखिकः

1. अधोलिखितानां प्रश्नानां उत्तरं वदत

(क) कः स्नातः कुशहस्तः सरस्तीरे ब्रुते ?

उत्तरं :– “व्याघ्रः स्नातः कुशहस्तः सरस्तीरे ब्रुते ।”

(ख) 'भाग्येनैतत्संभवति' - इति केन आलोचितम् ?

उत्तरं :- “भाग्येनैतत्संभवति – इति पान्थेन आलोचितम् ।”

(ग) वृद्धव्याघ्रः किं दातुम् इच्छति स्म ?

उत्तरं :- “वृद्धव्याघ्रः सुवर्णकङ्कणं दातुम् इच्छति स्म ।”

(घ) पथिकः कुत्र निमग्नः अभवत् ?

उत्तरं :- “पथिकः महापङ्के निमग्नः अभवत् ।”

(ङ) पथिकः केन व्यापादितः खादितश्च ?

उत्तरं :- “पथिकः व्याघ्रेण व्यापादितः खादितश्च ।”

2. उदाहरणमनुसृत्य उत्तरं वदत

(क) पठ् + क्त्वा = पठित्वा ।

(ख) खाद् + क्त्वा = खादित्वा ।

(ग) गम् + क्त्वा = गत्वा ।

(घ) दृश् + क्त्वा = दृष्ट्वा ।

(ङ) हस् + क्त्वा = हसित्वा ।

3. उदाहरणमनुसृत्य पञ्च पदानि वदत

(क) श्रु + तव्यत् = श्रोतव्यम् ।

(ख) गम् + तव्यत् = गन्तव्यम् ।

(ग) स्मृ + तव्यत् = स्मर्तव्यम् ।

(घ) कृ + तव्यत् = कर्त्तव्यम् ।

(ङ) हस् + तव्यत् = हसितव्यम् ।

4. उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितेषु पदेषु प्रकृतिं प्रत्ययं च वदत - मृ + क्तः = मृतः ।

(क) गम् + क्तः = गतः ।

(ख) वच् + क्तः = उक्तः ।

(ग) कृ + क्तः = कृतः ।

(घ) पठ् + क्तः = पठितः ।

(ङ) चल् + क्तः = चलितः ।

Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 का

अभ्यासः लिखितः

1. अधोलिखितानाम् प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत

(क) वृद्धव्याघ्रः कुत्र ब्रुते ?

उत्तरं :- “सरस्तीरे ।”

(ख) कः लोभाकृष्टः अभवत् ?

उत्तरं :- पथिकः ।

(ग) कः सुवर्णकङ्कणं दातुम् इच्छति स्म ?

उत्तरं :- वृद्धव्याघ्रः ।

(घ) कः स्नानशीलः दाता गलितनखदन्तः च आसीत् ?

उत्तरं :- वृद्धव्याघ्रः ।

(ङ) कः वंशहीन आसीत् ?

उत्तरं :- व्याघ्रः ।

(च) कः पङ्के अपतत् ?

उत्तरं :- पथिकः ।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत -

(क) 'कुत्र तव कङ्कणम्' इति कः अवदत् ?

उत्तरं :-  ” ‘कुत्र तव कङ्कणम्’ इति पथिकः अवदत् ।”

(ख) व्याघ्रः कीदृशः आसीत् ?

उत्तरं :-  ” व्याघ्रः वृद्धः दाता गलितनखदन्तः च आसीत् ।”

(ग) व्याघ्रेण कानि अधीतानि ?

उत्तरं :- ” व्याघ्रेण धर्मशास्त्राणि अधीतानि ।”

(घ) कस्य पुत्रा दाराश्च मृताः ?

उत्तरं :- ” व्याघ्रस्य पुत्रा दाराश्च मृताः ।”

(ङ) कः महापङ्के निमग्नः पलायितुमक्षमः ?

उत्तरं :- ” पथिकः महापङ्के निमग्नः पलायितुमक्षमः ।”

3. सन्धिविच्छेदं कुरूत

  • सरस्तीरे = सरः + तीरे ।
  • भाग्येनैतत्संभवति = भाग्येन् + एतत् + संभवति ।
  • पान्थोऽवदत् = पान्थः + अवदत् ।
  • वधान्मे = वधात् + मे ।
  • वंशहीनश्चाहम् = वंशहीनः + च + अहम् ।
  • धर्मशास्त्राण्यधीतानि = धर्मशास्त्राणि + अधीतानि ।
  • केनचिद्धार्मिकेणाहमादिष्टः = केनचित् + धार्मिकेण + अहम् + आदिष्टः ।
  • अतस्त्वामहमुत्थापयामि = अतः + त्वाम् + उत्थापयामि ।

4. अधोलिखितानां पदानां प्रकृति-प्रत्ययविभागं लिखत

  • स्नात्वा – स्ना + क्त्वा
  • स्नातुम् – स्ना + तुमुन्
  • प्रसार्य – प्र + सृ + ल्यप्
  • उपगम्य – उप + गम् + ल्यप्
  • उक्त्वा – वच् + क्त्वा
  • धृतः – धृ + क्तः

6. रिक्तस्थानानि पूरयत

(क) भो भोः पान्थाः! इदं–सुवर्णकङ्कणम्–गृह्यताम् ।
(ख) व्याघ्रः–हस्तम्–प्रसार्य दर्शयति ।
(ग) तदुपदेशादिदानीमहं कथं न —विश्वासभूमिः–।
(घ) वृद्धव्याध्रेण संप्राप्तः सः —पथिकः— मृतः ।
(ङ) अहह,– महापङ्के— पतितोऽसि ।

Conclusion :-

Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 || व्याघ्रपथिककथा पाठ से लोभ के बुरे परिणामों का पता चलता है। नारायण पंडित जी द्वारा लिखित “हितोपदेश” में प्रस्तुत इन कथाओं से बालकों को न केवल मनोरंजन मिलता है, बल्कि जीवन में नैतिकता और समझदारी भी मिलता है। यह अध्याय नीति और शिक्षा को शामिल करता है, इसलिए यह “Bihar Board Exam Objective Questions” की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी होगा। इस तरह, विद्यार्थी “Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 || व्याघ्रपथिककथा” पढ़कर जीवन में नैतिक मूल्यों का महत्व समझते हैं, जो उनके व्यक्तित्व को विकसित करने में सहायक हैं।

मुझे आशा है, कि उक्त लिखित पोस्ट Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 || का व्याघ्रपथिककथा पीयूषम् भाग 2 (vyaaghrapathikakatha) के सभी विश्लेषण को क्रमबद्ध तरीका से पढ़ें और समझें होंगे और आपके Bihar Board Class 10th Sanskrit Chapter 11 का विश्लेषण उपयोगी रहें होंगे ।

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